महाकवि संत गंगादास जी (१८२३- १९१३)

बाराह रूप के दरश हो निशि बासर मोहिं जान। गंगा दास है नाम मम तुम से कहूँ बखान॥

अन्तर नहीं भगवान में, राम कहो चाहे संत शुभाष गंगादास

अन्तर नहीं भगवान में, राम कहो चाहे संत ।
एक अंग तन संग में, रहे अनादि अनंत ।।

रहे अनादि अनंत, सिद्ध गुरु साधक चेले ।
तब हो गया अभेद भेद सतगुरु से लेले ।।

गंगादास ऐ आप ओई मंत्री अर मंतर ।
राम-संत के बीच कड़ी रहता ना अन्तर ।।

मेरठ के संत ने दी थी रानी लक्ष्मीबाई को मुखाग्नि:

देश मे 1857 में जब क्रांति की ज्वाला धधकी तो मेरठ के लोग आहुतियां देने में सबसे आगे थे। क्रांतिकारियों के साथ-साथ कवियों और संतो ने भी नौजवानों में देशभक्ति का जोश भरा। मेरठ के एक एैसे ही संत थे गंगादास, जिन्होंने आजादी की लडा़ई में महारानी लक्ष्मीबाई की भरपूर मदद की थी। यहां
तक कि लक्ष्मीबाई ने आखिरी सांस भी इनकी कुटिया में ली थी।

संत गंगादास जी का पराक्रम:

खड़ी बोली के प्रथम समर्थ कवि गंगादास का अवतरण भारत भूति तथा सम्पूर्ण हिन्दी जगत के लिए परम पिता परमात्मा की मानव जाति के लिए परम पिता परमात्मा की मानव जाति के लिए एक अद्वितीय भेंट है। इस युग में उन्होंने जन्म लेकर जीवन भर ब्रह्मचर्य का पालन किया। धर्म एवं समाज में भ्रष्टाचार व कुरुतियों पर कठोर व्यंग्य कर, वे संत कबीर के परवर्ती आसन पर पदासीन होने के योग्य थे। इनका नाम महाभारत ग्रंथ की रचना करने के कारण महर्षि वेद व्यास के तत्काल बाद लिखे जाने के योग्य था। गंगा सागर की रचना उन्हें सूरदास के समकक्ष बनाने की योग्यता रखता है। इनके मुख से निकला एक वाक्य ही नहीं अपितु एक-एक शब्द लिपिबद्ध करने तथा पूरे जगत के कल्याणार्थ प्रचार-प्रसार करने के योग्य है। इस महामानव ने धर्म, दर्शन, काव्य-ग्रंथों की रचना तथा देश भक्ति का मार्ग सुझाकर मनुष्य जाति पर महान उपकार किया है। उन्होंने दर्शन एवं भारतीय लोक संस्कृति का गौरवपूर्ण व्याख्यान कर देश वासियों में भय एवं निराशा की भावना को काव्यों को लिख तथा शक्ति प्रदर्शन कर दूर किया एवं निराशा की भावना को काव्यों को लिख ताकि शक्ति प्रदर्शन कर दूर किया एवं स्वाभिमान आत्मबल, संयम, आस्था, कर्तव्यनिष्ठा का संचार किया। एक बार तो ऐसा लगने लगा कि ब्रिटिश हुकुमत का परचम अब सदा-सदा के लिए भारत से विलुप्त हो जायेगा।

हिन्दी साहित्य में योगदान:

इस महान संत-कवि ने ९० वर्ष की अवधि में लगभग ५० काव्य-ग्रन्थों और अनेक स्फुट निर्गुण पदों की रचना की। इनमें से ४५ काव्य ग्रन्थ और लगभग ३००० स्फुट पद प्राप्त हो चुके हैं। इनमें से २५ कथा काव्य और शेष मुक्तक हैं। १९१३ ई. में जन्माष्टमी को प्रात: ६ बजे वे व्रह्मलीन हुए। उनकी इच्छानुसार इनके शिष्यों ने उनका पार्थिव शरीर परम-पावनी गंगा में प्रवाहित कर दिया। ज्ञान, भक्ति और काव्य की दृष्टि से संत-कवि गंगा दास का व्यक्तित्व अनूठा सामने आता है। परन्तु इनका काव्य अनुपलब्ध होने के कारण हिन्दी साहित्य में इनका उल्लेख नहीं हो पाया। कई विद्वानों ने तो इन्हें खड़ी बोली हिन्दी साहित्य का भीष्म पितामह कहा है।

संत गंगा दास की कुण्डलियाँ

बोए पेड़ बबूल के, खाना चाहे दाख।
ये गुन मत परकट करे, मनके मन में राख।।
मनके मन में राख, मनोरथ झूठे तेरे।
ये आगम के कथन, कदी फिरते ना फेरे।।
गंगादास कह मूढ़ समय बीती जब रोए।
दाख कहाँ से खाए पेड़ कीकर के बोए।।

संत गंगादास जी की प्रकाशित पुस्तकें:

महाकवि गंगादास की 50 रचनाये है,  जिनमे  से 45 प्राप्त हो चुकी है | उनमे से कुछ का संछिप्त विवरण कुछ इस प्रकार है |

अ ) हस्तलिखित पांडुलिपिया

  1. पूर्ण भक्त : 13 इंच * 8 इंच के पीले पत्रों पर हंसने की पांडुलिपि है विविध प्रकार के छंदों में लिखित 200 पृष्ठ का सुंदर कथा काव्य है पद संख्या 150 है |
  2. नरसी भक्त- कथा काव्य है पृष्ठ संख्या 42 और पद संख्या 50 है |
  3. ध्रुव भक्त- 7 गेय पदों और 108 पृष्ठ का कथा काव्य है |
  4.  निर्गुण पदावली – मुक्तक काव्य है वह पद संख्या 150 तथा पृष्ठ संख्या 200 है |
  5. कृष्ण जन्म – 48 पृष्ठों और 45 पदों का एक कथा काव्य है |
  6. श्रवण कुमार – पृष्ठ संख्या 20 और पद संख्या 19 है जगन कुमार की प्रसिद्ध तथा प्रसिद्ध कथा पर आधारित एक कथा काव्य है |
  7. नल पुराण –  पृष्ठ संख्या 122 और पद संख्या 185 है यह कथा काव्य कवि की अति सुंदर कृति है |
  8. राम कथा – संत गंगा दास ने रामचरितमानस की संपूर्ण कथा को अपनी पद शैली में कथा काव्य के रूप में प्रस्तुत किया है यह कई खंडों में भिन्न-भिन्न पुस्तकों के रूप में प्रकाशित भी की है , इसमें लंका कांड भरत मिलाप सुलोचना सती और सिया स्वयंवर अति प्रसिद्ध है |
  9. नाग लीला –41 पदों का कथा काव्य है |
  10. सुदामा चरित – 36 पदों का कथा काव्य है |
  11. महाभारत पदावली – इसमें उद्योग पर्व  से लेकर युधिष्ठिर के राजतिलक तक की कथा के पद शैली में कथा काव्य के रूप में प्रस्तुत की गई है |
  12. बली के पद – इसकी पदों की संख्या क्रमशः 21 और 34 है | यह एक लीलापरक काव्य है |
  13. रुकमणी मंगल – यह एक प्रेम कथा काव्य है |
  14. प्रह्लाद भक्त –35 पदों और 40 प्रश्नों की एक लीला पर कथा काव्य है |
  15. चंद्रवती नासिकेत – 94 प्रश्नों और 95 पदों के चरित्र कथा काव्य में नसिकेत और उसकी माता चंद्रावती की कथा अत्यंत कलात्मक शैली में वर्णित है, उद्दालक मुनि की धर्मपत्नी रघु कन्या चंद्र बोस के माध्यम से भक्ति योग और दर्शन का निरूपण है काव्य सरस है |
  16. पार्वती मंगल – 92 प्रस्ठो और 241 पदों के इस कथा काव्य में शिव विवाह का वर्णन सरस काव्य के माध्यम से प्रस्तुत है |
  17. भ्रमरगीत मंजरी – गोपियों के विरह के 12 पद अत्यंत सरस और भावाताम्क है |
  18.  कुण्डीलिया – विविध विषयों पर 270 कुंडलियों की एक मुक्तक काव्य है |
  19. पद हरिश्चंद्र – इसकी पद संख्या 91 संख्या 141 है, गेय पदात्मक शेली का एक चरितापरक कथा काव्य है |
  20. निर्गुण लावनी – यह एक मुक्तक काव्य रचना है ,जिसमे निर्गुण और वेदान्त दर्शन की 456 लवनिया है | 
  21. बारह खडी – देवनागरी वर्णमाला के आधार पर भूषण की शिवा बावनी की भांति यह निर्गुण रचना का मुक्तक काव्य ही है इसमें एक है साक्षी भी प्रातः की है कि इसकी रचना कवि ने संख्या 1952 में की है |

खड़ी बोली के पितामह

डॉ राजकुमार वर्मा ने संत गंगादास के बारे में लिखा है: यह संत कवि यद्यपि ज्ञान भक्ति काव्य में विशिष्ट प्रतिभावान रहा है, किंतु उनकी

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