मेरठ के संत ने दी थी रानी लक्ष्मीबाई को मुखाग्नि:

देश मे 1857 में जब क्रांति की ज्वाला धधकी तो मेरठ के लोग आहुतियां देने में सबसे आगे थे। क्रांतिकारियों के साथ-साथ कवियों और संतो ने भी नौजवानों में देशभक्ति का जोश भरा। मेरठ के एक एैसे ही संत थे गंगादास, जिन्होंने आजादी की लडा़ई में महारानी लक्ष्मीबाई की भरपूर मदद की थी। यहां
तक कि लक्ष्मीबाई ने आखिरी सांस भी इनकी कुटिया में ली थी।
अंग्रेजों की परवाह किये बिना गंगादास ने महारानी की चिता को मुखाग्नि भी दी थी। देशभक्ति का जज्बा ऐसा कि चिता की व्यवस्था नहीं हो सकी तो
संत ने अपनी कुटिया को ही स्वाह कर दिया।
चैधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय के हिन्दी विभागाध्यक्ष प्रो. नवीन चन्द्र लोहनी और उनके साथ कई प्रोजेक्ट वर्क कर चुके डॉ. रविन्द्र कुमार ने बताया कि
संत गंगादास पुराने मेरठ जिले के गढ़मुक्तेश्वर के रसूलपुर गाँव के रहने वाले थे। विभिन्न शोध के बाद उनके बारे मे तमाम जानकारियां सामने आई हैं। डॉ. रविन्द्र कुमार कहते हैं कि संत गंगादास द्वारा रानी लक्ष्मीबाई को मुखाग्नि देने का जिक्र आचार्य चतुर्सेन के उपन्यास ‘सोना और खून’ में किया गया है। इस उपन्यास के चार खंड है। इसके एक खंड रानी लक्ष्मीबाई के संघर्ष की गाथा को बयां किया गया है।
डॉ. रविन्द्र ने बताया कि संत गंगादास ने अंग्रेजों के खिलाफ आवाज उठाई और सामाजिक कुरीतियों को दूर करने का बीडा उठाया। संत गंगादास का जन्म गढ़मुक्तेश्वर के पास बाबूगढ़ छावनी के रसूलपुर गाँव में 1823 में बसंत पंचमी के अवसर पर कुटेसर चैपला स्थित उनकी समाधि पर हर साल मेला लगता है।
उन्होंने संत विष्णुदास से दीक्षा ग्रहण की। वे ग्वालियर में कुटिया बनाकर रहते थे और उन्होंने ही अपनी कुटिया को स्वाह कर वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई का अंतिम संस्कार किया था।

संत गंगादास जी का पराक्रम:

खड़ी बोली के प्रथम समर्थ कवि गंगादास का अवतरण भारत भूति तथा सम्पूर्ण हिन्दी जगत के लिए परम पिता परमात्मा की मानव जाति के लिए परम पिता परमात्मा की मानव जाति के लिए एक अद्वितीय भेंट है। इस युग में उन्होंने जन्म लेकर जीवन भर ब्रह्मचर्य का पालन किया। धर्म एवं समाज में भ्रष्टाचार व कुरुतियों पर कठोर व्यंग्य कर, वे संत कबीर के परवर्ती आसन पर पदासीन होने के योग्य थे। इनका नाम महाभारत ग्रंथ की रचना करने के कारण महर्षि वेद व्यास के तत्काल बाद लिखे जाने के योग्य था। गंगा सागर की रचना उन्हें सूरदास के समकक्ष बनाने की योग्यता रखता है। इनके मुख से निकला एक वाक्य ही नहीं अपितु एक-एक शब्द लिपिबद्ध करने तथा पूरे जगत के कल्याणार्थ प्रचार-प्रसार करने के योग्य है। इस महामानव ने धर्म, दर्शन, काव्य-ग्रंथों की रचना तथा देश भक्ति का मार्ग सुझाकर मनुष्य जाति पर महान उपकार किया है। उन्होंने दर्शन एवं भारतीय लोक संस्कृति का गौरवपूर्ण व्याख्यान कर देश वासियों में भय एवं निराशा की भावना को काव्यों को लिख तथा शक्ति प्रदर्शन कर दूर किया एवं निराशा की भावना को काव्यों को लिख ताकि शक्ति प्रदर्शन कर दूर किया एवं स्वाभिमान आत्मबल, संयम, आस्था, कर्तव्यनिष्ठा का संचार किया। एक बार तो ऐसा लगने लगा कि ब्रिटिश हुकुमत का परचम अब सदा-सदा के लिए भारत से विलुप्त हो जायेगा

हिन्दी साहित्य में योगदान:

इस महान संत-कवि ने ९० वर्ष की अवधि में लगभग ५० काव्य-ग्रन्थों और अनेक स्फुट निर्गुण पदों की रचना की। इनमें से ४५ काव्य ग्रन्थ और लगभग ३००० स्फुट पद प्राप्त हो चुके हैं। इनमें से २५ कथा काव्य और शेष मुक्तक हैं। १९१३ ई. में जन्माष्टमी को प्रात: ६ बजे वे व्रह्मलीन हुए। उनकी इच्छानुसार इनके शिष्यों ने उनका पार्थिव शरीर परम-पावनी गंगा में प्रवाहित कर दिया। ज्ञान, भक्ति और काव्य की दृष्टि से संत-कवि गंगा दास का व्यक्तित्व अनूठा सामने आता है। परन्तु इनका काव्य अनुपलब्ध होने के कारण हिन्दी साहित्य में इनका उल्लेख नहीं हो पाया। कई विद्वानों ने तो इन्हें खड़ी बोली हिन्दी साहित्य का भीष्म पितामह कहा है।

संत गंगा दास द्वारा रचित काव्य पर कु्छ विद्वानों के मत इस प्रकार है:

  • आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी – हिन्दी साहित्य के इतिहास में एक महत्वपूर्ण भूमिका के अतिरिक्त संत काव्य की सौन्दर्य दृष्टि और कला पर संत गंगा दास का काव्य सुंदर प्रकास डालता है।
  • डॉ रामकुमार वर्मा – ज्ञान भक्ति और काव्य की दृष्टि से संत कवि गंगा दास विशेष प्रतिभावान रहे है परन्तु इनका काव्य अनुपलब्ध होने के कारण हिन्दी साहित्य के इतिहास में इनका उल्लेख नहीं हो सका था।
  • डॉ गोपीनाथ तिवारी – जब भारतेंदु और ग्रियर्सन प्रभृति विद्वान खड़ी बोली को हिन्दी काव्य रचना के लिए अनुपयुक्त मान रहे थे उससे पहले केवल संत गंगादास अनेक सुंदर छंदों और वृत्रों द्वारा खड़ी बोली के कलापूर्ण और सुंदर काव्य की अनेक रचनाएं प्रस्तुत कर चुके थे।
  • डॉ विजयेन्द्र स्नातक – संत कवि गंगादास का काव्य भारतेंदु पूर्व खड़ी बोली हिन्दी काव्य का उच्चतम निर्देशन है और हिन्दी साहित्य के इतिहास की अनेक पुराणी मान्यताओं के परिवर्तन का स्पष्ट उद्घोष भी करता है।
 

संत गंगादास जी साहित्य पर शोध कार्य:

आधुनिक काल के किसी भी अन्य संत कवि पर इतने शोध ग्रंथ नहीं लिखे गए, जितने गंगादास-काव्य पर सवीकृत हुंए है। विवरण इस प्रकार है-
१- संत कवि गंगादास व्यक्तित्व एवं कृतित्व ’’विषय पर डा० जगन्नाथ शर्मा ‘हंस’ ने 1970 ई में सर्वप्रथत सफल शोधग्रंथ आगरा विश्वविद्यालय से स्वीकृत कराया और पीएच०डी० की उपाधि की।
तत्पश्चात् उन्हीं की प्रेरणा और निर्देशन में निम्न लिखित कार्य हुए-
२- महाकवि गंगादासके कथकाव्य – डा० ब्रजपाल सिंह ‘संत’ (दिल्ली)
३- संत गंगादास का रहस्यवाद –डा० पीतम सिंह (दिल्ली)
४- गंगादास-काव्य का सांस्कृतिक अध्ययन – डा० नित्यकिशोर (दिल्ली)
५- कबीर और गंगादास का दर्शनपरक तुलनात्मक अध्ययन स्वर्गीय – डा० श्रीमती राजेश्वती, मोदीपुरम, मेरठ
६- गंगादास और शंकर दास के काव्य का तुलनात्मक अध्ययन – डा० वेदप्रकाश ‘डबास’ दिल्ली
७- गंगादास-काव्य के प्रतीक –डा० मिथिलेश शर्मा, मुम्बई
८- गंगादस की भक्ति भावना और समाज दर्शन – डा० निर्मल ‘धनकड़’ रोहतक
९-संत गंगादास के विशेष संदर्भ में उदासीन कवियों की भक्ति भावना (डी० लिट० हेतु) – डा० वीरेन्द्र ‘कोशिक’ मोदीनगर
१॰- भारतेन्दू पूर्व खड़ी बोली काव्य (गंगादास के संदर्भ में) – डा० इन्द्र ‘सेंगर’ दिल्ली
११- संत गंगादास और भगवद्गीता के दर्शन का तुलनात्मक अध्ययन – डा० ब्रजमोहन ‘द्विवेदी’ कानपुर
१२- रहस्यवादी परम्परा और गंगादास – राजबीर सिंह ‘राड़’ रोहतक
१३- उदासीन संत काव्य में गंगादास का स्थान (डी० लिट् हेतु) – डा० जगननाथ शर्मा‘हंस’ दिल्ली

उपर्युक्त में से क्रम संख्या १,४,५,७,९ और १३ पर उल्लिखित आधा दर्जन शोधगंथ तो प्रकाशित भी चुके हैं।

संत गंगादास जी के बारे में अन्य साहित्यकार क्या कहते हैं:

 अनेक मूर्धन्य विद्वानों ने इस कार्य की भूरि-भूरि प्रंशसा की है-
     “डा० जगन्नाथ शर्मा के इस शोध-प्रबंध को मैं इसलिए महत्वपूर्ण मानता हूँ क्योंकि शोध-विषय ओर अनुसंधान-पद्धति की दृष्टि से यह एक उपयोगी कृति है। खड़ी बोली हिन्दी साहित्य केे इतिहास में एक महत्त्वपूर्ण भूमिका के अतिरिक्त संत काव्य की सौंदर्य दृष्टि और कला पर संत गंगादास का काव्य सुंदर प्रकाश डालता है।”        – आचार्य हजारी प्रसाद ‘द्विवेदी’
    “ज्ञान, भक्ति और काव्य की दृष्टि से संत कवि गंगादास विशेष प्रतिभावान रहे हैं, परंतु इनका काव्य अनुपलबध होने के कारण हिन्दी साहित्य के इतिहास में इनका उल्लेख नहीं हो सका था। डा० जगन्नाथ शर्मा ने अत्यन्त मनोयोग से इस कवि की रचनाएं खोजकर और उनकी सुन्दर समालोचना प्रस्तुत करके एक महत्त्वपूर्ण शोध कार्य किया है।”       – डा० रामकुमार ‘वर्मा
    “संत कवि गंगादास का काव्य भारतेन्दुपूर्व खड़ी बोली हिन्दी काव्य का अच्चतम निदर्शन है और हिन्दी साहित्य के इतिहास की अनेक पुरानी मान्यताओं के परिवर्तन का स्पष्ट उद्घोष भी करता है।”                                                            – डा० विजयेन्द्र ‘स्नातक’
    “जब भारतेन्दु और ग्रियर्सन प्रभृति विद्वान खड़ी बोली को हिन्दी काव्य-रचना के लिए अनुपयुक्त मान रहे थे, उससे बहुत पहले संत गंगादास अनेक सुन्दर छंदो और वृत्तों द्वारा खड़ी बोली के कलापूर्ण और सुन्दर काव्य की अनेक रचनाएं प्रस्तुत कर चुके थे।”                                        – डा० गोपीनाथ ‘तिवारी’
    इस संत का साहित्य इतना विपुल और सम्पन्न पाया गया कि डॉ० हंस ने अपने बाह्य और आन्तरिक निर्देशन में ही इस साहित्य के भिन्न-भिन्न विषयों पर विविध विश्वविद्यालयों से १५ शोधग्रंथ स्वीकृत कराए।

आचार्यत्वः

सस्वती के वरद पुत्र संत गंगादास अपने समय के एक आचार्य कवि थे। अतः हिन्दी के समस्त संत साहित्य में भिखारीदास के अतिरिक्त इनके मुकाबले का कोई और आचार्य संत कवि नहीं मिलता। गंगादास ने अपने समय के अन्य कवियों और षिश्यों को छन्द-षास्त्र का ज्ञान प्रदान करने के लिए ऐसे अनेक पदों की रचना भी की, जिनमें छन्द-षास्त्र के नियमों का कलात्मक निरूपण प्राप्त होता है। बटुक छन्द, हंसी छन्द और मालती आदि अनेक छन्द बनाने के नियम जो उन्होंने बतलाए हैं वे उनके गम्भीर पिंगल-षास्त्र ज्ञान के द्योतक है। यथा:
आदि नगण दो सगण अंत में। एक लघु, धर कहूँ तंत मैं।
‘छन्द बटुक’ कहूँ नाम संत मैं।
एक भगण फिर दो गुरु धरना। बीस वर्ण चारों पद करना। ‘हंसी’ नाम छन्द का बरना।
दो जगणों से कली बनावै। वर्जित सारे वर्ण बचावै।
छन्द ‘मालती’ या विधि गावै।
विभिन्न प्रकार के छन्दों में कुछ परिवर्तन करके भी उन्होंने अपने गीतों और पदों को अधिक सुन्दर बनाने का प्रयास किया है। एक स्थान पर वे कहते हैं कि मेरे इस गीत का नाम पिंगल षास्त्र में ‘दोधक’ है परन्तु मैंने इसका आदि और अन्त कुछ बढ़ा दिया हैः
‘‘पिंगल आगम छन्द का बोधक। षुभ अषुभ का षोधक।
‘गंगाादास’ नाम है ‘दोधक पिंगल में इस गीत का,
कुछ आदि और अन्त सवाया।।’’
कवि ने अनेक स्थानों पर षुद्ध लक्षणा और व्यंजना का प्रयोग तो किया ही है साथ ही पारम्परिक मुहावरे और लोकोक्तियों के प्रचुर प्रयोग से षब्दो की उक्त षक्तियाँ अधिक प्रभावषाली रूप् में प्रकट हुई हैं। छायावादी काव्य की भांति गंगादास के काव्य में लोकोक्तियों एवं मुहावरों का अभाव नहीं। कुरु प्रदेष की सहज भाशा में प्रयुक्त होने वाले देषज षब्दों और लोकोक्तियों का तो गंगादास-काव्य वृहद कोश है। विस्तार भय से यहाँ अधिक लिखना समीचीन नहीं। मैंने अपने पी-एच०-डी० के षोध प्रबन्ध (१९७॰) में सहस्त्रों लोकोक्तियों और मुहावरों की सूची गंगादास-काव्य से उद्धृत की है।

समालोचना:

संत गंगादास ने संतों द्वारा प्रतिपादित सभी विशयों को अनोखे ट़ंग से कहा है। उनकी कला और अभिव्यक्ति कई स्थानों पर कबीर आदि कवियों से भी अधिक उच्च कोटि की इसलिए बन पड़ी है, क्योंकि गंगादास का काव्य-षास्त्र विशयक ज्ञान हिन्दी के अनेक संत और भक्त कवियों से अधिक गम्भर रहा है। डाॅ० राम कुमार वर्मा का यह कथन समीचीन ही है कि ‘‘गंगादास का मूल्यांकन करने के लिए कबीर से उसका तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत होना आवष्यक है।’’ गंगादास ने छह चक्रों के वर्णन जैसे नीरस विशय को भी सरस बना दिया है। यथाः
‘‘मूलद्वार से पता लगै है, जहाँ पवन की सड़क बगै है, ‘
उससे आगे एक जगै है, नाभीपूर के पास में,
जहाँ नाका चैरासी का
तीन नगर आगे आते हैं, जहाँ पर ठग ठग ठग खाते हैं,
फिर प्रयागपुर में जाते हैं, बहें धारा तीन अकास में,
बड़ किला है कैलासी का।
कर तलास मन कैलास में, ले दरसन अविनासी का।‘‘
ज्ञान और भक्ति की दृश्टि से भी इस कवि का काव्य उच्च कोटि का और आकर्शक है। वेदानत-रिरूपण का एक उदाहरण दृश्टव्य हैः
‘‘बीजी जैसे व्यापक बट में, अरु माटी जैसे रहे घट में, तन्तू जैसे पूरन पट में, लोहा छूरी कटार में,
ऐसे एक नजर आवेगा।
एकला अंगी सर्व अंग में, बसे सर्वदा जल तरंग में,
नजर पड़े ना रहे संग में, सोना कुण्डल हार में,
सब काल में दरसावेगा।
इस भागवत को संसार में, कर तलास तब पावेगा।।’’
‘‘प्रकृति माया वृति से, महतत्व भया प्रकृति से’’ आदि पदों में सांख्य-प्रक्रिया का पूर्ण चित्रण उपलब्ध होता है।
दार्षनिक चट्टान पर भक्ति के जो चित्र गेंगादास ने उकेटे हैं और रागात्मकता का जो रंग अपनी कला की कूंची से भरा है, वह देखते ही बनता है। एक चित्र दृश्टव्य है-
‘मेरे पूरन पिछले भाग री, पिया घर आए फागन में।
जो पिया पाग रँग ल्यूँगी संग में,
दोनों हो जाएँ एक अंग में, कोई धब्बा रहे न दाग री,
अलि हो जाऊँ निरदागन मैं। पिया धर आए फागन में।।
सुरत संगी मन मृदंग में, विचार वीणा से उपंग में,
तीस रागनी लिये संग में, गावै है दवों राग री,
सुन हो गई वैरागन मैं। पिया घर आए फागन मे।।
और पिया के वियोग में वही गंगादास अपने भाग्य को सावन में सूखा देखकर गोपियों के रूप में किस प्रकार विलाप करते हैं, इसका एक उदाहरण ‘भ्रमरगीत मंजरी’ से दृश्टव्य हैः
‘सावन में सूखे रह गए, गिरधर बिन भाग हमारे। स्याम घटा घन घहर सी आवै, देख लहर पै लहर सी आवै,
हमें ष्याम बिन कहर सी आवै, म्हारी प्रीति के बिरवे दह गये,
सूखे सुख बाग हमारे।
बैरन तीज तपाती आई, अनल वियोग जगाती आई
काम की आग लगाती आई, रतिपति-मति में ख्वै गए,
फीके रस राग हमारे।’’
गंगादास के काव्य में सभी रसों का सुन्दर निरूपण हुआ है। उनके वीर रस के कवित्त पढ़कर भूशण की याद आ जाती है। अभिमन्यू की वीरता का यह उदाहरण दृश्टव्य है-
जैसे करि यूथन में, गरजै है केहर सो,
तैसे वीर कौरव के दल गयो गाजके।
एकन के खपे घोड़े एकन के सीस तोड़े।
एकन ने हाथ जोड़ें, एक चले भाजके।
कोई आँख रहा मीच, कोई कान रहा भींच,
कोई स्वाँस खींच भजे जात मारे लाज के।
देखें मुख षूरवीर, चाप की टंकोर दियों,
कृश्ण कृपा से सर तेगा मारे साज के।।
गंगादास-काव्य में अंगी रस ‘भक्ति’और ‘षान्त’ ही हैं। इनके पष्चात् वीर और अद्भुत रस की स्थिति प्र्यापत दृढ़ है। सभी रसों और अनेक ीावों का कलात्मक चित्रण साहित्य-षास्त्र की सुन्दर पद्धति पर आकर्शक ढंग से हुआ है। तत्कालीन समाज भी इस कवि के काव्य में न केवल मुखरित हो उठा है प्रत्युत सुन्दर आदर्ष के संकेत भी प्रापत करता है।

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