संत गंगा दास खड़ी बोली के साहित्य के भीष्म पितामह : डॉ हंस

संत गंगा दास खड़ी बोली के साहित्य के भीष्म पितामह : डॉ हंस

हापुर, १८ अक्टूबर । अंधकार की गर्त में समाए महान दार्शनिक भावुक भक्त, उदासी महात्मा महाकवि गंगा दास के विषय में आयोजित ‘ साहित्य यज्ञ ‘ में यहां एसएसवी डिग्री कॉलेज में साहित्यकारों प्रवक्ताओं और श्रोताओं को संबोधित करते हुए डॉ जगन्नाथ शर्मा हंस ने कहा कि हिंदी साहित्य में जब भारतेंदु हरिश्चंद्र से विद्वान खड़ी बोली को हिंदी काव्य रचना के अनुपयुक्त मान रहे थे ,उससे बहुत समय पहले संत गंगा दास अनेक सुंदर छंदों और वरंतौ द्वारा खड़ी बोली के कलापूर्ण और सुंदर काव्य की अनेक रचनाएं प्रस्तुत कर चुके थे। उन्होंने ‘ संत गंगा दास के साहित्य को समाज सुधार में योगदान ‘ विषय पर बोलते हुए कहा कि प्राचीन विद्वानों ने स्वीकार किया है कि संत गंगा दास से पहले खड़ी बोली पर रचित साहित्य में कृतिम खड़ी बोली का प्रयोग किया गया है ।
लोकोक्ति, मुहावरे आदि के अभाव में खड़ी बोली में वास्तविकता नहीं रही परंतु संत गंगा दास के साहित्य में उसे क्षेत्र का समूचा वातावरण मुहावरे व संबंधित क्षेत्र की मिट्टी की सुगंध समाहित है।
संत गंगा दास को प्रकाश में लाने वाले विद्वान डॉक्टर हंस ने कहा कि यदि खड़ी बोली के साहित्य का अध्ययन करें तो गंगा दास खड़ी बोली के साहित्य के पीतमेह भीषम सिद्ध होंगे। उन्होंने अपने काव्य द्वारा समाज में व्याप्त वातावरण को बदलने की चेष्टा की । समाज की बेचैनी का चयन पहुंचाने की शक्ति उनके साहित्य में है। संत गंगा दास का साहित्य तथा संस्कृति समाज में फैली बुराइयों को दूर करने के लिए पर्याप्त है ।
दिल्ली के डॉक्टर बृजपाल सिंह ने संत गंगा दास के जीवन पर प्रकाश डालते हुए कहा कि सरस्वती के व्रत पुत्र संत गंगा दास आचार्य कवि थे । अतः हिंदी के समस्त साहित्य में कालिदास के अतिरिक्त इन के मुकाबले का कोई और आचार्य संत कवि नहीं मिलता । गंगादास जिस भाषा में वाद्य यंत्र बजाते थे । तो उनके कंधों पर मयूर आकर बैठ जाते थे , गाय चारा खाना खाना छोड़कर उनके पास आकर एकत्रित हो जाया करती थी । वे कंठ से नहीं बल्कि हेर्दय से गाते थे । उनके मुख से गंगा निकलती थी। जिसकी समाज को आवश्यकता है ।
नगर शिक्षा अधिकारी नीसेशजार ने कहा कि गंगादास खड़ी बोली के आदि कवि थे । उनका काव्य भावात्मक तथा कलात्मक दोनों माध्यमों से सशक्त है ।वे निश्चित ही कबीर व तुलसी के तुल्य कवि हैं । उन्होंने समाज में व्याप्त नशाखोरी का विरोध किया ।कबीर तुलसी की तरह ही उन्होंने समाज को एक नया रास्ता दिखाने की कोशिश की ,समाज को दिशा निर्देश दिए तथा अंग्रेजी शासन का जमकर विरोध किया ।
डॉ प्रीतम सिंह ने गंगा के ग्रंथो का उल्लेख करते हुए कहा कि संत गंगादास सभी धर्मों से दूर थे । उन्होंने कहा कि यदि आप उनके साहित्य का अध्ययन करेंगे तो आप सभी अमानवीय तत्वों से दूर हटकर मानव से प्रेम करने लगेंगे और मंगलमय तन मन से गंगा के साहित्य यज्ञ में डॉक्टर तिलक सिंह, श्यामवीर सिंह, राकेश अग्रवाल ,अनिल वाजपेई, सचिव विजय गोयल, ब्रह्मपाल सिंह ने गंगा दास के जीवन और साहित्य पर प्रकाश डाला ।
कार्यक्रम की अध्यक्षता की जीवन आदर्श और साहित्यिक संदेशों को जीवन में उतारने का आग्रह किया ।
कार्यक्रम का शुभारंभ श्यामानंद सरस्वती मां सरस्वती के समक्ष दीप प्रज्वलित करके किया । श्वेता गर्ग तथा राखी सिंगल ने सरस्वती वंदना प्रस्तुत की । पत्रकार अवधेश श्रीवास्तव ने रसूलपुर गांव में जन्मे संत गंगा दास को लेकर उनके शोध घंटों का उल्लेख किया ।
प्राचार्य डॉ आर के गुप्ता, डॉ एस पी गुप्ता ,महेंद्र कुमार ने अतिथियों का सम्मान किया। डॉ राकेश अग्रवाल ने कार्यक्रम का संचालन किया ।

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