मेरठ के संत ने दी थी रानी लक्ष्मीबाई को मुखाग्नि

मेरठ के संत ने दी थी रानी लक्ष्मीबाई को मुखाग्नि

मेरठ – १० मई २०१३ | देश में १८५७ में जब क्रांति की ज्वाला धधकी तो मेरठ के लोग आहुती देने सबसे आगे आये थे | क्रांतिकारियों के साथ साथ कवियों और संतो ने भी नोजवानों में देशभक्ति का जोश भरा | मेरठ के एक ऐसे ही कवी थे गंगादास , जिन्होंने आजादी की लड़ाई में महारानी लक्ष्मीबाई की भरपूर मदद की थी | यहा तक कि लक्ष्मीबाई ने आखरी सांस इनकी कुटिया में ही ली थी |

अंग्रजो की परवाह किये बिना गंगादास ने महारानी की चीता को मुखागनी भी थी | देशभक्ति का जज्बा ऐसा कि चीता की व्यवस्था नही हो सकी तो संत ने अपनी कुटिया को ही स्वाहा कर दिया |

चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय के हिंदी विभाध्यक्ष प्रो. नवीन चन्द्र लोहनी और उनके साथ कई प्रोजेक्ट वर्क कर चुके डॉ रविन्द्र कुमार ने बताया कि संत गंगादास पुराने मेरठ जिले के गढ़मुक्तेश्वर के रसूलपुर गाव के रहने वाले थे | विभिन्न शोध के बाद उनके बारे में तमाम जानकारिया सामने आई है | डॉ रविन्द्र कुमार कहते है कि संत गंगादास द्वारा रानी लक्ष्मीबाई को मुखागनी देने का जिक्र आचार्य चत्रुसीन के उपन्यास ‘ सोना और खून ‘ में किया गया है | इस उपन्यास के चार खंड है | इसके एक खंड में रानी लक्ष्मीबाई के संघर्ष की गाथा को बयाँ किया गया है |

डॉ रविन्द्र ने बताया कि संत गंगादास ने अंग्रजो के खिलाफ आवाज़ उठाई और सामाजिक कुरीतियों को दूर करने का बीड़ा भी उठाया | संत गंगादास का जन्म गढ़मुक्तेश्वर के पास बाबूगढ़ छावनी के रसलपुर गावं में १८२३ में बसंत पंचमी के दिन हुआ था | आज भी बसंत पंचमी के अवसर पर कुटेसर चोपला स्थित उनकी समाधि पर साल मेला लगता है | उन्होंने संत विष्णुदास से दीक्षा ग्रहण की | वे ग्वालियर में कुटिया बनाकर रहते थे और उन्होंने ही अपनी कुटिया को स्वाहा कर वीरागना रानी लक्ष्मीबाई का अंतिम संस्कार किया था |

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