ज्ञान भक्ति और राष्ट्रीय भावना की त्रिवेणी थे भक्त गंगादास

ज्ञान भक्ति और राष्ट्रीय भावना की त्रिवेणी थे भक्त गंगादास

खड़ी बोली काव्य के माध्यम से गांव-गांव में भक्ति भागीरथी प्रवाहित करने वाले संत हृदय स्वामी गंगा दास का नाम अग्रणी है । महान दार्शनिक भावुक भक्त संत कवि गंगा दास कबीर दास की तरह फक्कड़ तथा क्रांतिकारी संत थे। उन्होंने अपने रचे पदों में जहां मानव को भगवान की भक्ति की प्रेरणा दी, वहीं समाज में व्याप्त कुरीतियों तथा अंधविश्वास पर व्यंग्य रूपी प्रहार करने में उन्होंने संकोच नहीं किया।
संत गंगा दास का जन्म प्राचीन तीर्थ गढ़मुक्तेश्वर क्षेत्र के ग्राम रसूलपुर में सन् 1823 की बसंत पंचमी के दिन चौधरी सुखीराम तथा दाखा देइ के पुत्र के रूप में हुआ ।उनके बचपन का नाम गंगाबखस् था । पिता बड़े जमीदार थे। गंगाबखस् बचपन से ही धार्मिक संस्कारों से ओतप्रोत होने लगे, जब छोटा बालक आंखें बंद कर भगवान का ध्यान करता ,नाम – संकीर्तन करता तो परिवारी जन भाव विभोर हो उठते थे । 10 वर्ष की आयु में ही माता पिता का देहांत हो जाने पर गंगादास पूरी तरह अपना समय भगवत साधना तथा संतों के सत्संग में बिताने लगे । 11 वर्ष की अवस्था में ही वे खेतों में हल और बैल छोड़कर कर गायब हो गए ।
उदासीन संप्रदाय के संत विष्णु दास जी के संपर्क में आकर गंगा दास ने अपना समस्त जीवन काव्य साधना तथा भगवत गीता के प्रचार प्रसार में लगाने का संकल्प ले लिया । संत विष्णु दास ने किशोर की निश्चल भक्ति भावना तथा प्रतिभा को परखा और उन्हें दीक्षा देकर गंगादास से ‘संत गंगा दास ‘ बना दिया। संत विष्णु दास ने संस्कृत का अध्ययन करने के बाद उन्हें धर्म ग्रंथों के गुण अध्ययन के लिए काशी भेज दिया। काशी में लगभग 20 वर्ष उन्होंने अध्ययन तथा साधना में व्यतीत किए।
संन् 1857 के स्वतंत्रता संग्राम की घटनाओं में भी संत दास के हृदय को प्रभावित किया इसी बीच में काशी से ग्वालियर पहुंचे।अनेक राष्ट्रभक्त, क्रांतिकारी उनसे कुटिया में मिलने आते थे। ऐतिहासिक नाटकों के लेखक वृंदावन लाल वर्मा ने अपनी झांसी की रानी पुस्तक में लिखा: ‘झांसी की रानी’ लक्ष्मीबाई अपनी अंतरंग सखी के साथ गुप्त रूप से ग्वालियर में संत गंगा दास के दर्शन के लिए उनकी कुटिया में गई थी । संत गंगा दास ने रानी को स्वाधीनता हेतु बलिदान के लिए तत्पर रहने की प्रेरणा दी ।उल्लेखनीय है की रानी लक्ष्मीबाई का दाह संस्कार 18 जून को ग्वालियर में संत के हाथों किया गया था ।
संत जीवन पर्यंत गांव का भ्रमण कर अपने उद्देश्य तथा पदों के माध्यम से श्रद्धा भक्ति को अलख जगाते रहे ।

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