खड़ी बोली के पितामह थे संत गंगादास

खड़ी बोली के पितामह थे संत गंगादास

हापुड़ , १४-०९-२००७ | हिंदी साहित्य में अन्य बोलियों के साथ साथ ख़डी बोली का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा है | हिंदी दिवस पर खडी बोली के उन्नायक रहे संत गंगादास को अविस्तृत करना खडी बोली के साथ अन्याय होगा |

हिंदी साहेत्य में विशेष योगदान करने वाले महाकवि गंगादास का जन्म हापुर छेत्र के बाबूगढ़ छावनी के निकट रसलपुर में १८२३ में बसंत पंचमी के दिन हुआ था | उनकी हिंदी साहित्य रचनाओं में खडी बोली का विकास हुआ | जिस कारण उन्हें खडी बोली का पितामह कहा जाता है | संत गंगादास के साहित्य में क्रांतिकारी काव्य रचनाओं के साथ-साथ आध्त्यामिक , सामाजिक और राजनितिक परिस्थियों का मार्गदर्शन होता है | उनका साहित्य अनेक पांडुलिपियो ओर प्रकशित पुस्तको के रूप में अखिल भारतीय गंगा दास हिंदी संस्थान,दिल्ली में डॉ जगनाथ शर्मा के संरक्षण में रखा था | कई विद्वानों ने उनके साहित्य पर शोध भी किये |

संत कवी ने लगभग ५० काव्य ग्रंथो और अनेक स्फुट निर्गुण पदों की रचना की | इनमे से ४५ काव्य ग्रन्थ और लगभग तीन हजार स्फुंट पद प्राप्त हो चुके है | इनमे से २५ काव्य कथा और शेष मुक्तक है | उनके काव्यो में अलंकारो और छन्दों का प्रयोग मिलता है | हस्त लिखित पांडुलिपिया ‘पूरन-भक्त ‘,’नरसी भक्त ‘ आदि है |

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