खड़ी बोली के पितामह

खड़ी बोली के पितामह

डॉ राजकुमार वर्मा ने संत गंगादास के बारे में लिखा है: यह संत कवि यद्यपि ज्ञान भक्ति काव्य में विशिष्ट प्रतिभावान रहा है, किंतु उनकी रचनाएं उपलब्ध न होने से हिंदी साहित्य के इतिहास में इनका उल्लेख होने से रह गया है ।
कभी-कभी साहित्यकार के साहित्य को संग्रहित नहीं करने की व्यक्तिगत उदासीनता साहित्य के इतिहास में अधूरापन छोड़ जाती है। संत गंगा दास के बारे में ऐसा ही हुआ । उन्हें लोक कवि मान कर उपेक्षित कर दिया गया, जबकि आज सर्वथा यह तय है कि खड़ी बोली के प्रथम कवि भारतेंदु नहीं संत गंगादास थे।संत महात्माओं की भांति संत गंगा दास ने अपने विषय में स्वयं प्रत्यक्ष रूप से कुछ नहीं कह कर त्यागवृति का परिचय दिया।
संत गंगा दास का जन्म दिल्ली मुरादाबाद मार्ग पर जिला गाजियाबाद के कस्बा सिंभावली के गांव रसूलपुर में एक जाट परिवार में सन 1823 में हुआ था। इनके पूर्वज पंजाब से आकर यहां बसे थे ।इनका वास्तविक नाम गंगाबछश था ।बचपन में माता-पिता की अकाल मृत्यु से संत गंगा दास के मन में बैराग पनपा।। बुलंदशहर के गांव सैदपुर के उदासीन संत विष्णु दास के शिष्य हो गए तथा वहीं अध्यन किया। बचपन से बैराग तथा विष्णु दास के शिष्य बनने का जिक्र संत दास ने अपनी एक पदावली में भी किया है।
अमृत रष् प्याल गोल भला, पी लिया था उम्र जरा सी में ।
कह गंगादास मेरा मन गया श्री विष्णु दास फकीर में ।
संत गंगादास ने विष्णु दास के आश्रम से लौटकर ग्राम रसूलपुर के बाहर एक कुटिया बनाकर खेती-बाड़ी प्रारंभ कर दी । उनके प्रतिद्वंदी कवि शंकर दास ने उन पर वयंग् भी कसा था।
हल जोते खेती करवाएं, उसे सब लोग संत बतावे।
सन् १८६० मे संत गंगादास हिन्डेन नदी के समीप गांव ललना चले गए। वहां उन्होंने साहित्य सर्जन किया । संत गंगा दास ने अंतिम 10 वर्ष मुक्तेश्वर में बाल विधवा शिष्या जियाकऔर के घर पर बिताए, वहां रहकर सन 1913 में उन्होंने 86 वर्ष की उम्र में समाधि ली।

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