खड़ी बोली का अग्रणी कवि संत गंगा दास मेरठ मंडल में ही सिमट कर रह गया

खड़ी बोली का अग्रणी कवि संत गंगा दास मेरठ मंडल में ही सिमट कर रह गया

खड़ी बोली के प्रथम कवि संत गंगा दास पर पूरा मेरठ मंडल गौरव करता है यह अब साहित्य जगत में कैसा हो गया है की खड़ी बोली के प्रथम कवि भारतेंदु हरिश्चंद्र नहीं बल्कि थाना सिंभावली के गांव रसूलपुर में जल में संत गंगा दास थे जो भारतेंदु हरिश्चंद्र से पहले जन्मे थे पर उनका नाम हिंदी साहित्य के इतिहास में जाने से रह गया आलोचक स्वयं डॉ राम कुमार शर्मा ने संत गंगा दास के बारे में टिप्पणी मै लिखा है यह संत कवि यद्यपि ज्ञान भक्ति और काव्य में विशिष्ट प्रतिभावान रहा किंतु उनकी रचनाएं उपलब्ध ना होने से हिंदी साहित्य के इतिहास में इनका उल्लेख होने से रह गया कभी-कभी साहित्यकार की अपने साहित्य को संकलित नहीं करने की व्यक्तिगत उदासीनता साहित्य के इतिहास में अधूरापन छोड़ जाती है संत गंगा दास के बारे में ऐसा ही हुआ उनके लोक कवि मानकर उपेक्षित कर दिया गया जबकि आज यह सर्वथा तय है कि खड़ी बोली के प्रथम कवि संत दास जी संत दास ने अपने विषय में स्वयं प्रत्यक्ष रूप से कुछ नहीं कहकर त्याग वृत्ति का परिचय दिया
संत गंगा दास का जन्म 1823 में हुआ था इनके पूर्वज पंजाब से आकर यहां बसे थे । इनके माता पिता की अकाल मृत्यु से संत गंगा दास के मन में बैराग पनपा ।
बुलंदशहर गांव के सैदपुर के उदासीन संत विष्णु दास के शिष्य हो गए तथा वही अध्यन किया इसी बीच काशी भी गए वहां धर्म ग्रंथों तथा संस्कृत भाषा का अध्ययन किया । बचपन से बैराग तथा विष्णु दास के शिष्य बनने का दास ने अपनी एक पदावली में भी किया है :
अमृत रस प्याला घोल भला,
पी लिया जरा सी में।
कह गंगादास मेरा मन लग गया,
श्री विष्णु दास फकीर मै।

संत गंगा दास ने विष्णु दास के आश्रम में लौटकर ग्राम रसूलपुर के बाहर एक कुटिया बनाकर खेती-बाड़ी प्रारंभ कर दी। उनके प्रतिद्वंदी कवि शंकर दास ने उन पर व्यंग भी कसा था।
हल जोते खेती करवाएं,
उसे सब लोग संत बतावे ।

सन १८६० में संत गंगा दास हिंडन नदी के लगे गांव ललना चले गए। वहां रहकर उन्होंने साहित्य सृजन किया संत गंगा दास ने अपने अंतिम 10 वर्ष गढ़मुक्तेश्वर में बाल विधवा शिष्य जिया कौर के घर पर बिताए ।वहां रहकर ही संत १९१३ में उन्होंने ८६ वर्ष की उम्र में समाधि ली । विडंबना यह है कि हिंदी साहित्य का संत कवि मेरठ मंडल में ही सिमट कर रह गया।
संत गंगा दास का अधिकांश साहित्य दिल्ली में अखिल भारतीय हिंदी संस्थान में सुरक्षित है ।इसी संस्थान में सुरक्षित रखें प्रकाशित तथा अप्रकाशित साहित्य के आधार पर कई विद्वानों ने संत गंगा दास पर शोध किया। संस्थान की स्थापना में विजेंद्र स्नातक, हरबंस लाल शर्मा तथा जगन्नाथ शर्मा का महत्वपूर्ण भूमिका रही है।

संस्थान के सहयोग से डॉक्टर बृजपाल सिंह ने ‘गंगा दास के कथा काव्य’ डॉक्टर पीतम सिंह शर्मा ने ‘संत गंगा दास के साहित्य में रहस्यवाद’ डॉक्टर नित्य किशोर ने ‘संत गंगा दास के साहित्य का सांस्कृतिक अध्ययन’ डॉक्टर जगन्नाथ शर्मा ने ‘उदासीन संप्रदाय के हिंदी कवि और उनका साहित्य’ तथा प्रो सुरेंद्र नाथ श्रीवास्तव ने ‘कबीर एवं संत गंगा दास के काव्य’ का तुलनात्मक अध्ययन विषय पर शोध ग्रंथ लिखे हैं।
संत गंगा दास की चर्चा के समय हिंदी साहित्य में संत परंपरा के इतिहास का अवलोकन किया जाए तो उनका सूत्रपात लगभग 900 वर्ष पूर्व भक्त जयदेव से हुआ था । पर संत परंपरा का निश्चित धरातल संत कबीर दास ने दिया था। आगे निर्वाह गुरु नानक देव ने किया। पर गुरु नानक के बाद संतों ने अपने अपने पंथो और संगठनों की अलग-अलग स्थापना की। संत गंगा दास ने कबीर की उदार चेतना का प्रतिपादन कर साहित्य का सृजन किया संत गंगा दास ने संपूर्ण साहित्य को चार वर्णों में विभाजित किया जा सकता है प्रकाशित,अप्रकाशित, अप्राप्त तथा मौखिक साहित्य जो लोगों की वाणी में है। संत गंगा दास की प्रकाशित 37 रचनाओं में गोवर्धन पूजा, हरीश चंद, पूरनमल, सिया स्वयंवर, भक्त श्रवण कुमार ,सुदामा चरित, नाग लीला, लक्ष्मण मूर्छा, लंका चढ़ाई, भरत मिलन,भजन महाभारत, तत्व ज्ञान ,ब्रम्हा ज्ञान ,चिंतामणि, पार्वती मंगल,गुरु चेला संवाद, बारह खंडी, ब्रह्मा ज्ञान, माला तथा गंगा विलास इन सभी पुस्तकों का प्रकाशन मेरठ के विभिन्न प्रश्नों ने किया ।
गंगा दास की अप्रकाशित रचनाओं में प्रमुख है: भक्त पुरनमल, ध्रुव भक्त, नरसी भक्ति, नव पुराण, महाभारत पदावली, बली के पद, रुक्मणी मंगल भक्त प्रहलाद, चंद्रावणी, नासिकेत, रामकथा, सती सुलोचना,भ्रमरगीत, मंजरी, कुंडलियां, पद, हरिश्चंद्र, द्रोपती चीर हरण ।
गंगा दास की अपर्याप्त रचना में प्रमुख है: वेदांत पदावली, आत्म दर्पण, वैराग्य संदीपनी, भजन महाभारत, अनुभव रत्नावली, आत्मकथा अभिमन्यु ।
मेरठ मंडल के ग्रामीण अंचल में आज भी संत गंगा दास के पद लोगों की वाणी में है।

संत गंगा दास का दौर असुरक्षा, आपली कल,फूट, वैमनस्य, रक्तपात और बर्बरता का था। उन्होंने अपनी रचनाओं में इस ओर इंगित भी किया है:
नीति हीन राजा अन्यायी,
वेद विरोधी सठ दुखदाई ।
पंथ चले वह तोल ना पाई,
कपटी वाना धरते हैं ।

व्यापार के वेश में अंग्रेजों के आगमन से संत गंगा दास विचउबुद्ध थे:
जो यह व्यापारी आए हैं,
टोटा देकर जाएंगे ,
पूंजी पाकर भरवाए हैं ।

अंग्रेजों को वापस चले जाने की हिदायत भी संत गंगा दास ने दी :
अब तुम अपने देश कू जाओ,
छोड़कर अब इस देश को जाओ । गंगादास हमेशा को जाओ ।

संत गंगा दास के बारे में छेमचंद्र सुमन ने लिखा है कि भारतेंदु हरिश्चंद्र ( जन्म १८५० ) से बहुत पहले संत गंगा दास ने खड़ी बोली की रचना करके हिंदी को जो स्वरूप प्रदान किया है ,वही बाद में विकसित होकर हिंदी काव्य का श्रंगार बना । संत गंगा मूलत: संत प्रकृति के कवि थे । उन्होंने अपनी आध्यात्मिक भावनाओं का प्रकटीकरण जिस भाषा में किया है वह भारतेंदु हरिश्चंद्र के साहित्य क्षेत्र में अवतरित होने से पहले की है ।
भारतेंदु हरिश्चंद्र ने भी अंग्रेजों के विरुद्ध भारत दुर्दशा पर कहा था : अंग्रेजी सत्र सुख सजे सब भारी,
पे धन विदेश चली जात रहें अति खवारि।
खड़ी बोली का एक रूप दास की इन पंक्तियों में मिलता है
जय कर थाल लिया है,
ज्ञान का दीपक बालिया है ।
तब घंटा तत्काल की लिया है ,
धूपकारी निष्काम की।
मॅने अनहद शंख बजाया
पूजा करके आत्माराम की
मैंने परमेश्वर पति पाया ।

खड़ी बोली का यह उदांत रूप भारतेंदु की कविता में नहीं दिखता है। आलोचक डॉ गोपी नाथ तिवारी ने बाल ब्रह्मचारी संत को पूर्व खड़ी बोली का प्रथम कवि सिद्ध करते हुए लिखा है जब भारतीय भारतेंदु जी तथा उनकी समकालीन भाषा को ही काव्य के लिए उपयुक्त स्वीकार कर रहे थे, तब एक कवि संत गंगा दास केवल खड़ी बोली को बोलकर ही रचना कर रहा था ।
डॉक्टर सुरेंद्र नाथ श्रीवास्तव ने अपने शोध प्रबंध में संत गंगा दास की तुलना संत कबीर से करते हुए लिखा है, दोनों संतो के तद युगीन परिस्थितियों के परिप्रेक्ष्य में काव्य रचना की है। युग की प्रवृत्तियां तथा अवधारणाओं से अछूते नहीं थे ।दोनों कवियों के जिस संवादी व सुधारवादी दृष्टिकोण को अपनाया वह आज भी उतना महत्वपूर्ण है। चित्र उस युग में था ।
संत गंगा दास के साहित्य की खोज अभी जारी है ।उनके समकालीन संत शंकर दास के साहित्य की भी खोज नहीं हो सकी ।पश्चिमी उत्तर प्रदेश खड़ी बोली का प्रतिनिधित्व करता है, वहां के ग्रामीण अंचलों में जाकर शोध किया जाए, तो लगेगा कि हिंदी साहित्य में संत गंगा दास का ही नहीं बहुत से कवियों का उल्लेख छूट गया है।

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